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Sunday, 18 February 2024

स्वामी प्रसाद, पल्लवी पटेल और अब सलीम शेरवानी... भाजपा से पहले सपा को ही 'तोड़' देगा अखिलेश यादव का PDA?

लखनऊः लोकसभा चुनाव को लेकर भाजपा के पाले को छोड़कर कहीं भी कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। सबसे ज्यादा खराब स्थिति में चल रहे हैं। भाजपा के एनडीए के खिलाफ उन्होंने पीडीए का शिगूफा छेड़ा था लेकिन मौजूदा माहौल देखकर लगता है कि उनका यह दांव मिसफायर होने वाला है। पहले , फिर और अब के बागी तेवर ने उनके पीडीए मुहिम को काफी धक्का पहुंचाया है। ऐसा लगता है कि पीडीए के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर उनकी ही पार्टी के लोगों को भरोसा नहीं हो रहा है। ऐसे में जनता के बीच वह अपने इस संदेश को कैसे संप्रेषित कर पाएंगे, इसे लेकर सवाल उठने लगे हैं।अखिलेश यादव ने जून 2023 में सपा की पीडीए- यानी कि पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक मुहिम की शुरुआत की थी। उनका दावा है कि ये तीनों वर्ग के लोग मिलकर उत्तर प्रदेश में भाजपा का रथ रोकेंगे। इसके जरिए अखिलेश गैर-यादव ओबीसी तथा यूपी में कमजोर पड़ रही मायावती की बीएसपी के कोर दलित वोटबैंक को साधना चाहते हैं। इतना ही नहीं, अपनी पार्टी के परंपरागत मुस्लिम वोटर्स को भी छिटकने से बचाने की कोशिश के तौर पर उनके इस अभियान को देखा गया। हालांकि, उनका यह अभियान बीजेपी को कोई नुकसान पहुंचाता, उससे पहले उनकी ही पार्टी को जर्जर करने की वजह बनता जा रहा है।स्वामी प्रसाद मौर्य ने पीडीए पर उठाए थे सवालपीडीए पर सबसे पहला हमला स्वामी प्रसाद मौर्य ने किया। मौर्य पार्टी के दलित और आदिवासी मोर्चे को संभाल रहे थे। उन्होंने इसके लिए तमाम ऐसे बयान दिए, जिसने यूपी ही नहीं देश भर में विवाद खड़े किए। सपा भी इन बयानों से असहज हुई और उसे मौर्य के बयान को 'निजी' कहकर अपना पल्ला झाड़ना पड़ा। स्वामी प्रसाद मौर्य पार्टी के इसी व्यवहार से नाराज हो गए। उन्होंने पार्टी नहीं छोड़ी लेकिन अखिलेश यादव का दिया हुआ महासचिव का पद छोड़ दिया। उन्होंने कहा कि जब अन्य महासचिवों के बयान उनके निजी बयान नहीं होते तो उनके बयान के साथ पार्टी भेदभाव क्यों कर रही है? उन्होंने यह भी दावा किया कि उनके इन्हीं कथित विवादित बयानों की वजह से ही दलित और आदिवासियों में सपा को लेकर विश्वास बढ़ा है। मौर्य के बागी तेवर ने सीधे तौर पर पीडीए में से "डी" यानी कि दलित वोटर्स को लेकर अखिलेश की वैचारिक प्रतिबद्धता पर सवाल उठा दिए।सलीम शेरवानी का झटकास्वामी प्रसाद मौर्य के बाद सलीम शेरवानी ने भी सपा के महासचिव का पद छोड़ दिया। हालांकि, पार्टी उन्होंने भी नहीं छोड़ी है लेकिन अपने राजनैतिक भविष्य को लेकर आने वाले दिनों में फैसला करने की बात कहकर उन्होंने इस संभावना को भी जिंदा छोड़ दिया है। शेरवानी ने मौर्य की तरह अखिलेश को चिट्ठी लिखकर ही पद से इस्तीफा दिया है। उन्होंने मुस्लिम वोटर्स को लेकर अखिलेश की नजरअंदाजी पर सवाल किया है। हाल ही में सपा की ओर से घोषित किए गए राज्यसभा के उम्मीदवारों पर उनकी नाराजगी थी। उन्होंने अखिलेश की मंशा पर यह कहकर सवाल उठाया है कि उनका नाम न सही लेकिन मुस्लिमों में भरोसा जगाने और बढ़ाने के लिए अखिलेश को कम से कम एक मुस्लिम उम्मीदवार को राज्यसभा भेजना चाहिए था। उन्होंने यह तक कह दिया है कि इस रवैये से अखिलेश की सपा और भाजपा में क्या अंतर रह जाता है?पल्लवी पटेल भी दिखा रहीं तेवरअपना दल कमेरावादी की पल्लवी पटेल सपा की सिंबल पर सिराथू से चुनाव लड़ी थीं और वह सपा विधायक ही कही जाती हैं। हालांकि, उनकी पार्टी अपना दल की सपा के साथ साझेदारी है। दोनों में लोकसभा चुनाव में सीट बंटवारे को लेकर खींचतान चल रही है। सपा अपना दल को मिर्जापुर समेत दो सीटें देने पर राजी है। वहीं पल्लवी अपनी पार्टी के लिए और सीटें चाहती हैं। पल्लवी पटेल हाल ही में वाराणसी में राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में शामिल हुई थीं। जबकि अखिलेश खुद इस यात्रा में अमेठी या रायबरेली में राहुल गांधी के साथ दिखाई देंगे। अखिलेश से स्वतंत्र होकर पहले ही कांग्रेस की न्याय यात्रा में शामिल होने के पल्लवी पटेल के इस फैसले को बगावत के तौर पर देखा जा रहा है। इससे पहले पल्लवी पटेल ने राज्यसभा चुनाव को लेकर अभी अखिलेश पर हमला बोला था। उन्होंने ऐलान किया था कि वह सपा उम्मीदवारों को वोट नहीं देगी। आलोक रंजन और जया बच्चन को लेकर टिप्पणी करते हुए पल्लवी ने कहा था कि ये लोग कहां से पीडीए में आ जाते हैं? उन्होंने अखिलेश पर मिलने का समय न देने का भी आरोप लगाया था और कहा था कि अगर वह अपनी मां के लिए राज्यसभा का टिकट चाहती थीं तो इसमें गलत क्या है? वह भी तो पार्टी का हिस्सा हैं। कुल मिलाकर पल्लवी पटेल में भी अखिलेश के पीडीए की उपेक्षा को लेकर गुस्सा है जो धीरे-धीरे बाहर आ रहा है और गठबंधन में एक और बड़ी टूट की भूमिका रच रहा है।राज्यसभा उम्मीदवारी से शुरू हुई बगावतबता दें कि उत्तर प्रदेश में 10 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव होने हैं। इसमें तीन सीटों पर सपा की जीत तय मानी जा रही है। इन तीन सीटों के लिए अखिलेश यादव ने जया बच्चन, आलोक रंजन और रामजी सुमन को उम्मीदवार बनाया है। इसे लेकर ही पार्टी और गठबंधन में घमासान मचा है। सलीम शेरवानी खुद राज्यसभा जाने की तैयारी कर रहे थे। वहीं पल्लवी पटेल अपनी मां कृष्णा पटेल के लिए टिकट चाहती थीं। अखिलेश पर इसे लेकर भी पार्टी के भीतर ही हमले किए जा रहे हैं कि उन्होंने राज्यसभा उम्मीदवार तय करने में अपने पीडीए फॉर्म्युले का भी ख्याल नहीं रखा।


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